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10 lines short stories with moral in Hindi

इस पोस्ट में हम आपको 10 lines short stories with moral in Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से 10 lines short stories with moral in Hindi पढ़ सकते हैं।

 

 

 

 

 

10 lines short stories with morals in Hindi

 

 

 

 

 

 

 

 

विवेक कक्षा पांच का छात्र था। वह खेलने में बहुत होशियार था लेकिन पढ़ाई में भी कम न था छोटा था इसलिए नटखट भी था उसके पिता का नाम रघु था। रघु का पूरा नाम रघुराज था। वह अपने घर पर ही किसानी का कार्य करता था रघु के घर से बाजार थोड़ा ही दूर था यानी पांच छः किलोमीटर।

 

 

 

 

रघुराज को उसके गांव विंदकी और जान पहचान वाले भी उन्हें रघु ही कहकर बुलाते थे। रघु यानी रघुराज सोनकर अपनी मेहनत से खेती के कार्य के साथ ही अपने पास के बाजार में एक स्वर्णकार के पास नौकरी भी करते थे जिसमे उन्हें दस हजार रूपये वेतन के रूप में प्राप्त हो जाते थे।

 

 

 

 

कुल मिला कर उनकी स्थिति ठीक ठाक थी। विवेक का एक छोटा भाई, उसका नाम था सुधीर। विवेक अपने स्कूल से आकर जब खेलने जाता था तब सुधीर भी गिरते पड़ते उसके पीछे अवश्य ही पहुंच जाताथा। पांच साल का विवेक और दो साल का सुधीर क्या जोड़ी थी।

 

 

 

 

उन दोनों को जो देखता वह मंत्रमुग्ध हो जाता कारण कि दोनों ही छोटे बच्चे थे लेकिन विवेक थोड़ा यानी तीन साल बड़ा था इस कारण उसके खेलने में ब्यवधान उत्पन्न हो जाता था। विवेक जब सुधीर को डांटता था तब वह रोने के वजाय बाल सुलभ आदत में हस देता था। उसके उपरके और नीचे के दो दो दांत रजत के समान ही चमक उठते थे।

 

 

 

 

ऊपर से पतले होठ जो अरुणिमा लिए हुवे होते थे बहुत ही सुंदर लगते थे। विवेक न चाहते हुवे भी उसे नहीं डाट सकता था लेकिन उसे उठा कर घर की तरफ चल देता। घर आने के बाद ही वह  नजर बचा कर पढ़ने के लिए बैठता था लेकिन कुछ समय के उपरान्त ही सुधीर रेंगते हुए जाकर विवेक की पीठ पकड़ कर खड़ा हो जाता।

 

 

 

 

उसके मन में बाल सुलभ जिज्ञासा होती थी कि वह भी विवेक के जैसे ही कुछ लिखे लेकिन दो साल बच्चा कुछ कह नहीं सकता था। इशारो से ही विवेक की पेन्सिल की तरफ बताता था। विवेक भी उससे अपना पीछा छुड़ाने केलिए उसे एक पेन्सिल का टुकड़ा और एक दप्ती दे देता लेकिन वह दप्ती को फेक कर कॉपी की तरफ इशारा करता।

 

 

 

 

विवेक उसे टालने की गरज से एक रद्दी कापी दे देता तब ही सुधीर को संतोष होता था तथा वह भी पेन्सिल से उस  रद्दी कॉपी पर गोलाकार वृत्त बनाता रहता था। जब तक विवेक पढ़ाई करके नहीं उठता तब तक सुधीर भी उसके पास बैठ कर अपने ही अंदाज में पढ़ाई करता रहता।

 

 

 

 

यह सब रघु और कंचन देखते तो उन्हें असीम ख़ुशी होती थी। रघु कहता कंचन देखना एक दिन सुधीर बहुत बड़ा आदमी बनेगा। विवेक अब कक्षा छः का छात्र था, उसके कक्षा में ही नरेश नाम का एक लड़का पढ़ता था नरेश भी पढ़ाई में बहुत तीब्र था।

 

 

 

 

नरेश की प्रायः विवेक से पढ़ाई के विषय में मुठभेड़ होती रहती थी ,मुठभेड़ के दौरान कोई भी हार नहीं मानता था। मास्टर को ही बीच में पड़कर उन दोनों को समझाना पड़ता था। .कभी कभी तो दोनों के अकाट्य तर्क से मास्टर भी हतप्रभ रह जाते थे।

 

 

 

 

नरेश के पिता का नाम राजीव प्रजापति था वह मिट्टी के बर्तन बनाने के अच्छे कारीगर थे। उनकी एक छोटी लड़की थी उसका नाम रजनी था रजनी की माता का नाम मालती था। मालती राजीव के कार्य में हाथ बंटाती थी तथा बच्चो की परवरिश करती थी। राजीव के पास खेत के नाम पर कुछ भी नहीं था।

 

 

 

 

मिट्टी का बर्तन बनाने का उनका पैतृक कार्य था और उसी कार्य के भरोसेसे उन्हें चार प्राणी का पालनपोषण करना था।हर माता पिता की इच्छा होती है कि  उसका बच्चा पढ़ लिख कर अच्छी तरह से जिंदगी व्यतीत करे लेकिन निज चेती होती नहीं….. ?

 

 

 

 

प्रताप भारती एक उद्योगपती था। उसके पास पच्चीस कपड़ा प्रेस करने की दुकान थी और प्र्त्येक दुकान में उसके पास पांच आदमी काम करते थे इस तरह से उसके पास एक सौ पच्चीस आदमी काम करते थे। उसके पास एक कन्या थी उसका नाम निशा था।

 

 

 

 

प्रतापकी कहानी भी बहुत रोचक थी प्रताप भी विंदकी के पास वाले गाँव का रहने वाला था। उसके पिता का कपड़ा धोने का पैतृक कार्य था उसी कार्य को प्रताप ने विकसित करके विस्तृत क्र दिया था प्रताप की धर्म पत्नी का देहांत हो गया था लेकिन उनकी निशानी के रूप में निशा को ही प्रताप ने जीने का सहारा बना लिया था।

 

 

 

 

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